Marriage is Not A Business To Occupy Each Other But it is About Helping Each Other

शादी एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति पर कब्जा पाने का व्यवसाय नहीं बल्कि उसका साथ देने और लेने का निर्णय है........!!!


हमारे देश मे पितृसत्ता सोच हमारी इंसानियत को इतना जकड़े हुये है कि आज भी इसको कायम करने वालो की संख्या ज्यादा है, लेकिन हमे सोचना चाहिए कि हर इंसान के अपनी जिंदगी के जीने और कुछ करने के सपने होते है जिसे वो पुरा करना चाहता है वो चाहे महिला हो या पुरुष हो, किसी को इस सपने को पुरा करने के लिए किसी ना किसी रूप मे साथ चाहिए होता है जो उसे अपनी मंजिल तक पहुंचा मे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से मदद करता है, 


इन सपनो को पूरा करने के लिए सबसे पहले उसके माता पिता की जरूरत व भुमिका होती है और अपने परिवार के अन्य सदस्यो, रिश्तेदार व दोस्त व अपनो की भुमिका भी एक अपना अहम भूमिका अदा करती है, 


व्यक्ति का व्यस्क होने पर एक ऐसा मोड़ उसकी जिंदगी में आता है और उसकी जिंदगी मे एक इन्सान हमसफ़र के रूप में आता है जिसे हम पति व पत्नि के रूप मे स्वीकार करते है, साथ ही यही एक मोड़ ऐसा होता है जिससे इंसान अपने सपनो की मुकाम को पाने के महत्वपूर्ण पलो को जीता है और अपनी जिम्मेदारियो को भी निभाता है, 


इस सफ़र को तय करने के लिए पुरुष को इतनी कठिनायो से नहीं गुजरना पड़ता है और इस शादीशुदा जिंदगी से कोई ज्यादा बदलाव नहीं होता है क्योंकि वही घर वही सोच और वही अपने परिवारजन, दोस्त व पडौसी होते है, लेकिन एक महिला के लिये इस शादीशुदा जिंदगी की शुरुआत करने हेतु बहुत सारा अपनी जिंदगी जीने, रहने व काम करने जगह, सोच व रहन-सहन के तौर तरिको मे बदलाव करना पड़ता है जो हर किसी भी इंसान के लिए बहुत मुश्किल होता है, लेकिन वो महिला अपनो की खुशी के लिए सब कुछ त्याग कर एक नये जीवन की शुरुआत करती है और हर एक नये सदस्य को अपना कर अपनी सारी खुशी उनको खुश करने पर लौटा देती है, 


उसका खाना, पीना, उठना बैठना, सोना, आना, जाना, हंसना, बोलना व पहनने के तौर तरीका ही पूरी तरह बदल जाता है क्योंकि वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर रहकर अपनी जिंदगी की शुरुआत करती है, 


एक महिला व पत्नि के रूप में इस बदलाव की जिंदगी को जीते हुये भी आज के आधुनिक भारत में महिला को इंसान के रूप में तवज्जो नहीं मिलता है, ना उसके द्वारा किये गये काम की गिनती की जाती है और ना ही उसके द्वारा किये गये अपने सपनो के त्याग की गिनती की जाती है, 


आज भी ज्यादातर महिलाये अपनी मर्जी से नहीं पति और परिवार की मर्जी से जिंदगी को जी रही है जिसकी वजह से उनके मूलभूत अधिकारो का हर सेकंड और मिनट मे हनन होता है, अगर कोई महिला अपने अधिकारो का उपयोग करना चाहती है तो उसको चरित्रहीन की उपाधि दे दी जाती है जिसके माध्यम से उसको हर समय जलील कर उसका जीवन दुभर कर दिया जाता है, 


ये हमारा समाज आज भी पितृसत्ता सोच के साथ जिन्दा है जिसका सबसे ज्यादा असर एक महिला पर पड़ता है, क्योंकि आज भी लोग एक महिला को जीवनसाथी ना समझ कर अपनी सम्पत्ति समझते हैं.......


सुमन देवठिया (Founder- Aagaaz Foundation)