सामाजिक शिक्षा महज स्कूल की किताबे पढ़ने से ही हासिल नहीं होती बल्कि समाज के बीच जीवन जीकर अनुभव लेने व समाज के बीच रहने वाले बुद्धिजीवी लोगों की कलम को पढ़ने व जुबान को सुनने से ही हासिल होती है..........!!! 

 हम सब लोगों को बहुत खुशी होती है जब हम हमारे समाज के लोगों को शिक्षा के क्षेत्र मे आगे बढते देखते है, इस शिक्षा की वजह आज देश- विदेशों में सभी अपने अपने क्षेत्रों में उन्नति के पथ पर है, खैर वंचित समुदाय के हर व्यक्ति को होना भी चाहिए क्योंकि हर उंचाई के आसमान को छूना उनका हक व अधिकार है, बहुत शदियो से देश मे स्थापित मनु वर्णव्यवस्था ने वंचित लोगों को उनके हक और अधिकारो से दूर रखा गया, 

आज महज उंचाइयो के रास्ते पर चलने व उनके संघर्ष को समझने के लिए उनके जीवन के बारे में जानने हेतु लोगों को उनके समुदाय के बीच जाना होगा क्योंकि यह हकीकत अनुभव और दर्द के संघर्ष को कभी भी किसी स्कूल की किताबे पढ़ने से महसूस नहीं किया जा सकता है, 

 इसी हकिकत को बयान करने हेतु वंचित समुदाय हमेशा अपने समुदाय की दशा और दिशा पर खुद हर हकिकत उजागर करने व साँझा करने हेतु अपनी जुबान और कलम से बेबाक बोलने हेतु स्थान, अवसर पर अपने नेतृत्व का कब्जा स्थापित कर रहे हैं और आज के दौर मे इस नेतृत्व को मजबूत बनाने की तलाश मे है, इस तरह की तलाश भला वंचित समुदाय करे भी क्यों नहीं क्योंकि बाबा साहब अम्बेडकर, सावित्री बाई सहित अन्य महापुरुषो के सामाजिक कार्य को आगे ले जाना भी जरूरी व नैतिक जिम्मेदारी है, 

 लेकिन ऐसी स्थिति मे भी एक तस्वीर हर रोज आयना दिखा रहा है कि आज के दौर में कुछ लोग इस तलाश मे वर्ण व्यवस्था मे विश्वास करने वाले लोग, समुदाय व परिवार से मिली विरासत के लोग व उनका बढ़ता वंशानुगत वंशधारी लोग समाज में आज भी परेशानी और संघर्ष के बीच जी रहा उस हर वंचित इंसान को सोची समझी साजिश के आधार पर दरकिनार करता नजर आ रहा है, फ़िर चाहे उसके आधार जातीवाद हो, पितृसत्ता हो, गरीबी हो, शहरी- ग्रामीण सोच व स्वायत्तता स्थापित करने वाली भाषा हो, 

 वैसे इन सभी उपरोक्त विचारों के दायरो मे बदलाव आया है लेकिन अपने रूप बदलकर अपना घेरा आज भी बनाये रखा है, इस घेरे को तोड़ने के लिए ऐसी विचारधारा मे विश्वास करने वाले लोग ना ही खुद अपने आप को पीछे कर रहे हैं और ना ही अंतिम पायदान पर बैठा व्यक्ति खुद इतनी हिम्मत कर पा रहा है, 

 लेकिन आज इस वंचित समुदाय के लोगों ने किताबी शिक्षा के दम पर शिक्षा हासिल कर अपने अपने क्षेत्रों में उच्च पदो और व्यवसाय में स्थान बनाये हुये है जो बहुत ही गर्व महसूस करवाने वाली खुशमय अनुभूति देने वाली बात है, लेकिन कई बार यह भी नजारा देखने को मिलता है कि ये लोग अपने आप की नेतृत्वकर्ता और निर्णयक होने की परिभाषा तय कर खुद को ज्ञाता व विद्वान होने के नशे में चूर हुये दिखाई देते है, लेकिन हम उन ज्ञाता व विद्वान लोगों का सम्मान कर उनकी बातो को स्वीकार करते हैं, बशर्ते ये लोग समुदाय के प्रति इमानदार, कर्मठ व समुदाय की हर परेशानी व संघर्ष के साथ चलने का परिचय देकर समुदाय के बीच विश्वास स्थापित करे, 

 लेकिन आज भी यह सवाल जिन्दा है व सोचने हेतु विचारणीय बिंदु यह है कि क्या मात्र किताबी शिक्षा प्राप्त करने से सामाजिक शिक्षा प्राप्त हो जायेगी और सामाजिक बदलाव हो जायेगा, ??? अगर हम ऐसा सोचते है तो कन्ही ना कन्ही आधुनिक गैरबराबरी स्थापित करने वालो की श्रेणी मे खड़ा कर रहे हैं और देश मे इंसानियत जिन्दा रखने, सामाजिक बदलाव स्थापित करने हेतु किये जा रहे कार्य मे हर बार नई चुनौती के लिये रास्ते खोल रहे है, 

 इसलिए अच्छा यही है कि पहले ही हमे स्वीकार कर लेना चाहिए कि सामाजिक शिक्षा महज स्कूल की किताबे पढ़ने से ही हासिल नहीं होती बल्कि समाज के बीच जीवन जीकर अनुभव लेने व समाज के बीच रहने वाले बुद्धिजीवी लोगों की कलम को पढ़ने व जुबान को सुनने से ही हासिल होती है......!!! 

आपकी साथी 
 सुमन देवठिया (Founder- Aagaaz Foundation)